भोगनीपुर में दलित परिवार पर हमला: पुलिस बनी ‘समझौते की दुकान’, इंसाफ के बदले मिला उपदेश
कानपुर देहात के भोगनीपुर कोतवाली क्षेत्र के पिलखनी गांव में 25 मार्च की रात एक दलित परिवार पर जो बीती, उसने कानून-व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। दबंगों ने न केवल घर में घुसकर परिवार के युवक को पीटा, बल्कि पूरे घर को आग के हवाले कर दिया। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात ये रही कि पीड़ित परिवार को थाने से इंसाफ नहीं, बल्कि 'समझौते का ज्ञान' थमा दिया गया।
कहां से शुरू हुआ विवाद?
इस पूरे मामले की शुरुआत एक बेहद मामूली बात से हुई थी। गांव के स्कूली बच्चों के बीच झगड़ा हो गया। बच्चों का झगड़ा बच्चों तक सीमित रहकर सुलझ भी गया था। लेकिन गांव के कुछ दबंगों को यह बात बर्दाश्त नहीं हुई। उन्होंने इसे अपनी 'शान का सवाल' बना लिया और अगले ही दिन करीब दर्जनभर लोग पीड़ित दलित परिवार के घर जा पहुंचे।
विमल नाम के युवक को बेरहमी से पीटा गया। उसकी चीखें सुनकर परिवार के लोग और आसपास के ग्रामीण दौड़े, लेकिन तब तक दबंगों ने घर में आग लगा दी। घर जलता रहा, परिवार की उम्मीदें राख होती रहीं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी उम्मीद — पुलिस — खुद धुएं में खो गई।
थाने पहुंचे, लेकिन मिला ‘शांत रहो, समझौता कर लो’ का उपदेश
जब पीड़ित परिवार थाने पहुंचा, तो उन्हें उम्मीद थी कि अब न्याय मिलेगा, अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। मगर भोगनीपुर पुलिस ने एकदम अलग रवैया अपनाया। एफआईआर दर्ज करने के बजाय उन्हें थाने में घंटों बैठा लिया गया और कहा गया — “मामले को यहीं सुलझा लो, समझौता कर लो, मुकदमे में पड़ोगे तो परेशान हो जाओगे।”
पुलिस की ओर से ना केवल कार्रवाई नहीं की गई, बल्कि परिवार पर यह दबाव भी बनाया गया कि वे इस मामले को आगे न बढ़ाएं। परिवार को बार-बार समझाया गया कि झगड़ा बढ़ाने से कुछ नहीं मिलेगा, उल्टा गांव में दुश्मनी बढ़ जाएगी। पीड़ितों का दर्द सुनने के बजाय पुलिस ने वही पुरानी स्क्रिप्ट दोहराई — “शांति रखो, समझौता सबसे अच्छा समाधान है।”
थाने से मायूस होकर परिवार अस्पताल पहुंचा, लेकिन वहां भी निराशा हाथ लगी। डॉक्टरों ने घायल युवक का इलाज करने से इनकार कर दिया। उन्होंने साफ कह दिया — “पुलिस रिपोर्ट लाओ, तभी इलाज होगा।” जब पुलिस ही रिपोर्ट नहीं लिख रही, तो इलाज कहां से हो? पीड़ित युवक तड़पता रहा, और सिस्टम आंखें मूंदे बैठा रहा।
पुलिस की भूमिका : समझौते का हेडक्वार्टर
भोगनीपुर थाने की भूमिका अब 'कानून लागू करने वाले' से बदलकर 'समझौता विशेषज्ञ' की हो गई है। यहां अपराध हो या अन्याय, पुलिस का पहला सुझाव होता है:
“मामला बड़ा मत बनाओ, समझौता कर लो।”
“रिपोर्ट लिखाने से कुछ नहीं होगा, गांव में अमन बनाए रखो।”
“अगर मुकदमा करोगे, तो खुद ही कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाओगे।”
लगता है जैसे थाना नहीं, कोई ‘समझौते का काउंसलिंग सेंटर’ चल रहा हो। पुलिस वालों को अब वर्दी के बजाय ‘समझौते के ब्रांड एंबेसडर’ का तमगा दे देना चाहिए।
इंसाफ की पुकार
जब थाने और अस्पताल से निराश होकर पीड़ित परिवार ने जिला पुलिस अधीक्षक से गुहार लगाई, तब जाकर कहीं उनकी बात सुनी गई। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर पीड़ित को एसपी दफ्तर तक जाना पड़ेगा? क्या थानों में अब कानून की किताबों के बजाय 'समझौते के फार्म' और 'धैर्य रखो' के पोस्टर ही रह गए हैं?
कुछ जरूरी सवाल:
1. क्या दलित परिवारों को न्याय पाने के लिए थाने से लेकर एसपी ऑफिस तक भटकना ही पड़ेगा?
2. क्या पुलिस का काम अपराध रोकना है या सिर्फ मामला रफा-दफा करना?
3. जब दबंग बेलगाम हैं और पुलिस नाकाम, तो गांव में आम लोग कैसे सुरक्षित महसूस करेंगे?
भोगनीपुर थाने की इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सिस्टम में सुधार की सख्त जरूरत है। वहां पीड़ितों को न कानून मिल रहा है, न सुरक्षा और न ही न्याय — केवल 'समझौते का ज्ञान' और 'धैर्य का पाठ' पढ़ाया जा रहा है।
शायद अब समय आ गया है कि थाने के बाहर लिखा जाए —
“यहां एफआईआर नहीं, केवल समझौते की सलाह दी जाती है।”
क्योंकि भोगनीपुर में फिलहाल, न्याय सिर्फ किताबों में है — और थाने में है बस ‘समझौते का ऑफर’।
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