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झांसी से कानपुर हाईवे: गड्ढों की सड़क, हादसों का रास्ता और टोल वसूली की दुकान!

झांसी से कानपुर हाईवे: गड्ढों की सड़क, हादसों का रास्ता और टोल वसूली की दुकान!


झांसी से कानपुर की ओर जाने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) संख्या 27 पर सफर करना आजकल ऐसा अनुभव देता है, जैसे आप जीवन-मृत्यु के बीच झूल रहे हों। सड़क कहने को राष्ट्रीय राजमार्ग है, लेकिन हकीकत में यह ‘राष्ट्रीय गड्ढा मार्ग’ बन चुका है। इस हाईवे पर चलना किसी एडवेंचर से कम नहीं। और सबसे मज़े की बात — सड़क टूटे, चाहे हादसे हों, चाहे जानें जाएँ, टोल प्लाजा वाले बिना मुस्कुराए पैसे ले लेंगे। आखिर, देश का विकास टोल से ही तो होता है ना! सड़क है या नहीं — ये उनका सिरदर्द नहीं।


गड्ढों में सड़क है या सड़क में गड्ढे — यह सवाल सबसे बड़ा!



जब आप झांसी से निकलकर कानपुर की तरफ सफर शुरू करते हैं, तो पहले कुछ किलोमीटर तक आप सोचेंगे कि सब ठीक है। लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, सड़क पर ऐसे गड्ढे मिलने लगते हैं, जिन्हें देखकर गाड़ी चलाना नहीं, गाड़ी को किसी युद्ध क्षेत्र में ले जाना महसूस होता है। कुछ जगहों पर तो सड़क का नामोनिशान नहीं, बस गड्ढों की श्रृंखला चल रही है।


ये गड्ढे छोटे-मोटे नहीं हैं। इनमें से कुछ ऐसे हैं कि कार का पहिया पूरा समा जाए और गाड़ी वहीं बैठ जाए। बाइक सवारों के लिए तो ये गड्ढे रोज का खतरा हैं। हर रोज किसी न किसी की बाइक इन गड्ढों में जाकर फिसलती है। कोई घायल होता है, कोई अस्पताल जाता है और कई बार तो कफन तक की नौबत आ जाती है।


हादसे रोजमर्रा की कहानी, लेकिन अधिकारियों की आँखें बंद!



हर हफ्ते इन सड़कों पर हादसे होते हैं। कभी बस पलटती है, कभी ट्रक पलटता है, कभी किसी मासूम बाइक सवार की जान चली जाती है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि हाईवे अथॉरिटी के लिए यह सब ‘नॉर्मल’ हो चुका है। पूछो तो जवाब मिलता है — "मरम्मत का काम जल्द ही शुरू होगा।"


कब शुरू होगा ये ‘जल्द’, इसका कोई टाइमलाइन नहीं। गड्ढों को भरने के नाम पर कभी-कभार ट्रॉली मिट्टी या कच्चा मटेरियल डालकर ‘फोटो सेशन’ जरूर करा लिया जाता है, लेकिन दो बारिशों के बाद वही हालत वापस आ जाती है।

टोल प्लाज़ा — जहाँ सड़क न हो, लेकिन पैसा पूरा वसूला जाए!



अब सबसे दिलचस्प हिस्सा — बारा जोर टोल प्लाजा। यहां पहुँचते ही लगता है कि आप पांच सितारा होटल में प्रवेश कर रहे हैं। कर्मचारियों का रवैया ऐसा, जैसे किसी लग्ज़री सर्विस का चार्ज लिया जा रहा हो। कार, जीप वालों से ₹180 एक तरफा और वापसी के ₹265; बस या ट्रक से ₹570 एक तरफ और वापसी ₹855; सात एक्सल वाले भारी वाहनों से ₹1110 एकतरफ़ा — और बदले में क्या मिलता है? ‘गड्ढा एक्सपीरियंस’!


मजेदार बात ये है कि यहां मासिक पास भी उपलब्ध हैं। सोचिए, कोई इतनी टूटी सड़क पर हर दिन जाने के लिए मासिक पास भी लेता है। वो कौन सा ‘महान’ इंसान होगा, ये जानना भी शोध का विषय है।


कानपुर देहात यातायात विभाग — आंखें बंद, कान बंद, मुँह बंद!



अब बात करते हैं ट्रैफिक विभाग की। ओवरलोड ट्रक और डंपर रात-दिन धड़ल्ले से चलते हैं। कई बार तो ट्रक इतने भरे होते हैं कि टायर तक चपटा हो जाता है। लेकिन रोकने वाला कोई नहीं। कभी-कभी तो लगता है जैसे ट्रैफिक पुलिस और परिवहन विभाग ने खुद ही इन्हें पास दे रखा हो — "बेटा, आराम से चलो, कोई नहीं रोकेगा!"


इन ट्रकों के कारण सड़कें और तेजी से टूट रही हैं। हादसे भी बढ़ रहे हैं। लेकिन अधिकारी या तो आराम से एसी ऑफिस में बैठे हैं, या मौके पर दिखें भी तो बस मोबाइल पर व्यस्त मिलते हैं।


अनचाहे कट — हादसों के गुप्त एजेंट!

हाईवे पर अजीब-अजीब जगह कट बना दिए गए हैं। न कोई साइनेज, न कोई दिशा। वाहन चालक को अचानक ही सामने कट दिखता है और बस… ब्रेक लगे या न लगें, गाड़ी पलटने की गारंटी। कई बार तो ये कट ऐसे जगह बनाए गए हैं, जहां से मुड़ना मौत को बुलावा देना है।


आवारा जानवर: ‘हाइवे के असली मालिक’



अब बात करें उन आवारा जानवरों की जो इस हाईवे के ‘VIP’ हैं। कहीं गाय लेटी है, कहीं बैल आराम फरमा रहे हैं। बीच सड़क पर ऐसे डेरा डाले रहते हैं जैसे ये उनकी निजी ज़मीन हो। अगर आप हॉर्न भी बजाएँ, तो पलटकर देखेंगे भी नहीं। मानो कह रहे हों — "हमको यहां से हटाने की हिम्मत है तो दिखाओ!"


सरकार और प्रशासन का 'नौटंकी मोड' चालू!


हादसे होते हैं, गड्ढे गहराते हैं, लोग मरते हैं, लेकिन प्रशासन का बयान हमेशा वही — "मामले की जांच की जा रही है। संबंधित विभाग को सूचना दे दी गई है। जल्द कार्रवाई होगी।"


वो ‘जल्द’ कब आएगा, ये किसी को नहीं पता। टोल वसूली के लिए बकायदा समय पर रेट अपडेट होते हैं, लेकिन सड़क मरम्मत के लिए फंड ‘फाइलों’ में घूमता रहता है।


जिम्मेदार अधिकारी — कुर्सी से उठने की जहमत नहीं!


हाईवे अथॉरिटी के अधिकारियों को अगर एक दिन इस सड़क पर बाइक से चलवा दिया जाए, तो शायद इन्हें भी समझ आए कि जनता क्या झेल रही है। पर अफसोस! वे सिर्फ बड़ी-बड़ी गाड़ियों में ही चलते हैं और सड़क की हालत पर केवल ‘नोट’ लिखते हैं।


जनता का गुस्सा आसमान पर

स्थानीय लोग अब यह कहने लगे हैं कि अगर सरकार या विभाग खुद इस सड़क पर दिन में एक बार सफर करे, तो शायद समस्या की असलियत समझ आए। लेकिन ऐसा होगा नहीं, क्योंकि जिम्मेदार लोग केवल प्रेस रिलीज़ में 'संवेदनशील' हैं, असल में नहीं।


1. हाईवे अथॉरिटी — गड्ढे भरे नहीं, अब तो गड्ढों के लिए अलग से टोल वसूल लीजिए। ‘गड्ढा अनुभव शुल्क’ के नाम से नया स्लैब बना ही डालिए।



2. प्रशासन — आप लोग इतने शांत कैसे हैं? सड़कें बर्बाद हैं, हादसे हो रहे हैं, और आप सिर्फ मीटिंग कर रहे हैं? कमाल है!



3. यातायात पुलिस — ओवरलोड ट्रक पर कार्रवाई करना भूल जाइए, उन्हें लाल कालीन बिछाकर सलामी ही दे दीजिए। शायद आपके और उनके रिश्ते और मजबूत हो जाएँ!


अब जनता करे तो क्या करे? घर से निकलते वक्त भगवान का नाम लेकर ही निकलें। साथ में दवाई और फर्स्ट एड किट भी रखें। और सबसे जरूरी — अगर यात्रा से सही सलामत घर आ जाएं तो ऊपर वाले का धन्यवाद करना मत भूलें।


झांसी-कानपुर हाईवे आज दुर्घटना मार्ग बन चुका है। अधिकारी मौन हैं, प्रशासन सो रहा है और जनता मर रही है। टोल वसूली में कोई कोताही नहीं, लेकिन सुविधा शून्य। ओवरलोड वाहन, टूटे-फूटे कट, आवारा जानवर और गड्ढों से भरी सड़क — सब मिलकर जानलेवा कॉम्बो तैयार कर रहे हैं।


अब वक्त है कि जिम्मेदार अधिकारियों की कुर्सियां हिलाई जाएँ और जवाब तलब किया जाए। वरना एक दिन जनता ही सड़क पर उतरकर आंदोलन करेगी — और तब न कोई टोल वसूलेगा, न अधिकारी प्रेस नोट जारी करेंगे। फिर सिर्फ सड़क पर जनता का गुस्सा दिखाई देगा।


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