गोवंश सुरक्षा की हकीकत: प्रशासनिक निरीक्षण की पोल खोलता सच
कानपुर देहात में गोवंश की सुरक्षा और उनके बेहतर देखभाल के लिए प्रशासन ने हाल ही में कड़ी निगरानी की घोषणा की है। मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) लक्ष्मी एन. ने जनपद की सभी गौशालाओं का औचक निरीक्षण किया और अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। हालांकि, प्रशासन की इस सक्रियता के बावजूद गौशालाओं की वास्तविक स्थिति कुछ और ही बयां करती है। सरकार और प्रशासन केवल बयानबाजी में व्यस्त हैं, जबकि ज़मीनी हकीकत में गोवंश तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहे हैं।
निरीक्षण की हकीकत और व्यवस्थाओं की अनदेखी
सीडीओ ने गर्मी और हीट वेव को देखते हुए गौशालाओं में हरे चारे, भूसे और पानी की समुचित व्यवस्था के निर्देश दिए, लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी अलग है। कई गौशालाओं में पशुओं को सूखा भूसा और गंदा पानी दिया जा रहा है। हरे चारे की व्यवस्था का तो कोई नामोनिशान तक नहीं है। पशुओं के लिए रखे गए पानी के टैंकर खाली पड़े हैं, और जो थोड़ा-बहुत पानी उपलब्ध है, वह कीचड़ और गंदगी से भरा हुआ है। यह प्रशासन की नाकामी और भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा प्रमाण है।
गौशालाओं में छाया की पर्याप्त सुविधा सुनिश्चित करने की बात भी कही गई, लेकिन कई स्थानों पर पशु खुले आसमान के नीचे झुलसने को मजबूर हैं। टीन शेड और अन्य छाया की व्यवस्थाएं आधी-अधूरी हैं, जिससे पशुओं को भीषण गर्मी में राहत नहीं मिल पा रही है। प्रशासन के अधिकारी वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर योजनाएं बनाने में व्यस्त हैं, लेकिन जमीन पर हकीकत इससे कोसों दूर है।
पशु चिकित्सा सुविधाओं की दुर्दशा
निरीक्षण के दौरान सीडीओ ने पशु चिकित्सा सेवाओं में सुधार की आवश्यकता जताई, लेकिन इन सेवाओं की मौजूदा हालत किसी से छिपी नहीं है। ज्यादातर गौशालाओं में नियमित रूप से पशु चिकित्सकों की उपस्थिति दर्ज नहीं होती, और बीमार पशु इलाज के अभाव में तड़पते रहते हैं। कई जगह तो मर चुके पशुओं के शव तक गौशालाओं में पड़े मिलते हैं, जिससे प्रशासन की लापरवाही साफ झलकती है। सरकारी रिकॉर्ड में तो हर गौशाला में डॉक्टर और दवाइयां उपलब्ध हैं, लेकिन असल में यह सुविधा सिर्फ कागजों पर सिमट कर रह गई है।
पोल खोलता प्रशासनिक रवैया
निरीक्षण के दौरान सीडीओ ने पाई गई कमियों को दूर करने के लिए अधिकारियों को तीन दिन का समय दिया। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब प्रशासन पहले से ही इन समस्याओं से वाकिफ था, तो अब तक कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए? यह साफ दिखता है कि निरीक्षण केवल दिखावे तक सीमित रह गया है।
सीडीओ ने चेतावनी दी कि अगली बार कमियां मिलने पर दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी, लेकिन क्या इससे पहले हुई अनियमितताओं पर कोई ठोस कार्रवाई हुई? गौशालाओं में हो रही धांधली, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही का सबसे बड़ा खामियाजा इन बेजुबान गोवंशों को भुगतना पड़ रहा है। एक तरफ सरकार गौशालाओं के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, दूसरी तरफ जमीनी हकीकत में पशु तिल-तिल कर मरने को मजबूर हैं।
सरकार और प्रशासन की असल जिम्मेदारी
सरकार गौशालाओं के रखरखाव और गोवंश सुरक्षा के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च करती है, लेकिन यह धनराशि कहां जा रही है, इसका कोई जवाबदेह नहीं है। यदि यह पैसा वास्तव में गौशालाओं पर खर्च हो रहा होता, तो आज यह दुर्दशा देखने को न मिलती।
सरकारी योजनाएं सिर्फ कागजों पर चल रही हैं, जबकि जमीनी स्तर पर इनका क्रियान्वयन पूरी तरह से फेल हो चुका है। अधिकारी निरीक्षण के नाम पर केवल दिखावा करते हैं और भ्रष्टाचार का खेल बदस्तूर जारी रहता है। अगर प्रशासन वास्तव में गोवंश कल्याण को लेकर गंभीर होता, तो आज हालात कुछ और ही होते।
जनता को इस धांधली के खिलाफ आवाज उठानी होगी और प्रशासन से जवाब मांगना होगा कि आखिर कब तक निरीक्षण के नाम पर सिर्फ औपचारिकताएं निभाई जाएंगी? बेजुबान गोवंश की सुरक्षा की यह जमीनी हकीकत सरकार और प्रशासन की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। जब तक सरकार और प्रशासन की मिलीभगत खत्म नहीं होगी, तब तक निरीक्षण के नाम पर सिर्फ कागजी कार्रवाई ही चलती रहेगी और बेजुबान जानवर इसी तरह अपनी जान गंवाते रहेंगे।
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